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नृसिंह कवचम वक्ष्येऽ प्रह्लादनोदितं पुरा
सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनं
सर्वसंपत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम
ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितं
विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिंदुसमप्रभं
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